गुरु ने दिया ज्ञान और शिष्य बन गया महान

एक गुरु जो बूढ़ा हो रहा था उसने अपने सरण में एक शिष्य को लिया और उस शिष्य को अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण ज्ञान दिया जिसके बाद शिष्य भी ज्ञानी बन गया क्यों कि गुरु ने दिया ज्ञान और शिष्य बन गया महान।

गुरु ने दिया ज्ञान और शिष्य बन गया महान की शूरुआत

दूर घने जंगल के बिच उँचे पहाड़ो पर एक बहुत बड़े और ज्ञानी गुरु रहते थे। अपने पुरे जीवन मे उन्होने कभी किसी को अपना शिष्य नही बनाया था।

बहुत लोग उनके पास उनका शिष्य बनने का ख्वाब ले कर आते थे,लेकिन वह कभी किसी को अपना शिष्य नही बनाते थे।

समय बितता गया कुछ सालो बाद गुरु जी बूढ़े हो गये थे। अब उन्हे रोज़ मर्रा के काम करने मे भी बहुत तकलीफ होती थी।

इसलिए उन्होने सोचा की किसी को अपना शिष्य बना लेता हूं, इससे मेरी भी मदद हो जायेगी।

लेकिन अब कोई भी उनका शिष्य नही बनना चाहता था। सब लोग का कहना था की कौन उस पागल गुरु के पास जाएगा और उनका शिष्य बनेगा।

वह किसी को अपना शिष्य नही बनाएंगे,बल्कि कोई भी उनके पास शिष्य बनने जाएगा उसे वह डांट कर भगा देंगे।

लेकिन एक दिन एक युवक ने अपना सामान बांध और उस घने जंगल के बिच ऊचे पहाड़ पर गुरु जी का शिष्य बनने की आशा मे पहूंच गया।

वहां पहूंचते ही उसने गुरु जी को कहा हे गुरु जी, आप चाहे तो मुझे डांट ले, दण्ड दे आप जो चाहे मै उसके लिये तैयार हूं, लेकिन मुझे आप अपना शिष्य बना लें।

लड़का बहुत ही सहज भाव से गुरु जी से कहता है मै आप से वह ज्ञान प्राप्त करने का इछुक हुँँ जिसे आपने आज तक किसी को नही दिया है।

गुरु जी ने लड़के को कहा ठीक है मै तुम्हे अपना शिष्य स्वीकार करता हूं। कल से मै तुम्हे ज्ञान दूँगा। गुरु जी ने लड़के को कुटिया मे रहने को कहा।

रात हो चुका था शिष्य को प्यास लगी वह पानी ढूंढने लगा, गुरु जी ने उसे पानी ढूंढता देख कहा आज ऐसे ही सो जाओ,आज पानी नही है। कल सुबह पानी लेने चलेंगे।

अगली सुबह गुरु जी शिष्य को अपने साथ ले कर पानी लेने चल पड़े।

शिष्य को बहुत प्यास लगी थी उसका गला सुखा हुआ था वह जल्द से जल्द पानी पीना चाहता था। दोनो कुएँ के पास पहुँच गये, शिष्य ने जल्दी से कुएँ से पानी निकाला और पी गया।

गुरु जी थोड़े क्रोधित होते बोले अरे! नालायक मुझे भी प्यास लगी है मुझे भूल गये,मुझे भी पानी चाहिये।

शिष्य ने गुरु से माफी मांगी और पानी पिलया। शिष्य ने कहा गुरुदेव आप आज मुझे ज्ञान देने वाले थे, वह ज्ञान क्या है?

गुरु जी ने कहा तुम इस कुएँ से कुछपानी निकालो, शिष्य ने पानी निकाला तब गुरु जी ने कहा तुमने जो पानी पी लिया और यह पानी जो तुम्हारे हाथो मे है इस मे क्या फर्क़ है?

शिष्य ने गुरु को जवाब देते हुए कहा, गुरुदेव मैने जो पानी पिया वह तो मेरे पेट मे है दोनो मे मै कैसे अंतर बता सकता हूं, अंतर बताने के लिये दोनो पानी का सामने होना जरुरी है।

गुरु जी ने शिष्य को घूर कर देखा और कहा  मनुष्य के अंदर किसी चीज़ के लिये उत्पन हुआ प्यास बहुत गहरी होती है,तब मनुष्य उस प्यास के निवारण के लिये अपनी सम्पूर्ण ऊर्जा लगा देता है। तब उसे चारो तरफ उसकी प्यास बुझाने वाली ही चीजें दिखाई देती है।

उसके आस पास क्या है यह उसे नज़र नही आता। उसी प्रकार जब तुम्हे पानी मिला तब तुम मुझे भूल गये थे उस समय केवल तम्हें पानी ही नज़र आया।

अभी भी तुम्हारे हाथो मे पानी है लेकिन अब तुम्हारे चारो ओर बहुत कुछ है।

पानी भले ही वैसे हो जैसा तुमने पहले पिया हो,लेकिन यह वह पानी नही है जिस पानी के लिये तुम व्याकुल थे।

देखो अभी भी तुम इस पानी को अपने हाथों मे लिये खड़े हो,   शायद  तुम इसे अब ना पीयो या हो सकता है की तुम इसे फेक दोगे।

तुम्हारे हाथों मे जो पानी है तुमने जो पानी पिया और इस कुएँ मे जो पानी है सब एक है लेकिन हमारे मन के स्तिथि के कारन यह हमे अलग अलग नज़र आता है।

आर्थत सबकुछ तुम्हारे अंदर बदलता है बाहर कुछ भी नही।

शिष्य यह सुन कर बहुत प्रसन्न हुआ, उसने अपने थैली से एक लेखनी निकाली और गुरु जी के कहे शब्दों को लिखना शुरु कर दिया।

गुरु ने कहा यह क्या कर रहे हो? शिष्य ने कहा आप ने जो कहा मै उसे लिख रहा हूं बाद मे मैं इसे याद भी करूंगा। तभी तो मै भी ज्ञानी बनुंगा।

गुरु जी ने शिष्य को देखा और कहा चलो आश्रम चलते हैं, भिक्षा भी मांगनी है। दोनो भिक्षा मांग कर रात का खाना खा कर सो गये।

अगली सुबह गुरु जी ने शिष्य को उठाया और कहा जल्दी चलो, वह शिष्य को लेकर कुएँ के पास पहुँचे। वहां पहुँच कर गुरू जी ने शिष्य को कहा की कुएँ से पानी निकालो। शिष्य ने कुए से पानी निकाला।

गुरू जी ने कहा अब बताओ कल जो तुमने पानी पिया था और आज जो तुमने पानी पिया उसमे क्या अंतर है।

तब शिष्य ने अपने थैली से कल का लिखा हुआ निकाल और पढ़ने लगा। तब गुरू ने कहा क्या कर रहे हो,पानी को सूंघो, जब शिष्य ने पानी को सूंघा उसे उस पानी से बदबू आई।

उसने गुरू जी से कहा यह पानी तो सडा हुआ है इसमे से बहुत बदबू आ रही है।

तब गुरू ने कहा देखो उस कुएँ मे सायद कोई जानवर उसमे गीर कर मर गया है। शिष्य ने कुएँ मे झांक कर देखा सच मे एक जानवर उस कुएँ मे गिरा हुआ था, शिष्य ने उसे बाहर निकाला।

गुरू ने कहा देखो इस जानवर को, जो भी इस धरती पर जन्म लेता है आवश्यक ही वह मृत्यु को प्राप्त होता ही है ।

जब हम जन्म लेते है उस समय जीवन हम मे सम्पूर्ण होता है और मृत्यु शुन्य होती है लेकिन धीरे धीरे जीवन घटता जाता है और मृत्यु बढ़ता जाता है।

हमारी यात्रा जन्म से मृत्यु की तरफ होती है। किसी के लिये यह तेज होती है तो किसी के लिये धीरे, लेकिन यह कभी रुकता नही है।

शिष्य ने अपनी लेखनी मे गुरू की सारी बातों को लिख लिया। गुरू ने कहा चलो इस कुएँ की ओर शिष्य ने गुरू के पैर पकड़ लिये और कहा कृपया मुझे इस कुएँ मे ना गिराये।

मै अभी मरना नही चाहता, गुरुजी ने कहा अरे मूर्ख, मै तो बस यह कह रहा हूं की चलो कुएँ के चारो ओर सुखे झाड़ लगा देते हैं ताकी कोई और जानवर ना गीरे।

गुरु ने अपना सबसे महत्वपूर्ण ज्ञान बतलाया

एक दिन शिष्य ने गुरू से कहा गुरू जी आप मुझे वह ज्ञान दिजीये जो सबसे बडा हो, वैसे भी आपकी उम्र हो चुकी है, अगर आप मुझे यह ज्ञान देंगे तो मै इसे लोगो तक पहुँचा सकता हूं।

शिष्य लेखनी ले कर बैठा था। गुरू जी मौन रहे, यह देख शिष्य ने अपनी लेखनी के सबसे उपार लिखा बडा ज्ञान और निचे मौन।

एक साल हो चुके थे वह रोज गुरू जी से वही सवाल पूछता और अपनी लेखनी मे मौन लिखता।

एक रात शिष्य चांदनी रात मे बैठा था। वह बैठा बैठा सोच रहा था की गुरुजी उसे वह ज्ञान क्यूं नही दे रहे है।

तभी अचानक उसने एक पक्षी की चहचाहट सुनी वह उस की तरफ आकर्षित हुआ, उसने पेड़ो के पत्तो को हिलते हुए उसकी सर्सराहट सुनी। ठंडी चल रही हवा को उसने महसूस किया।

तभी उसने सनाटा महसूस किया लेकिन उस सनाटे मे उसने कुछ आवाजे भी सुनी।

वह अपनी आँखे बंद कर महसूस कर रहा था। उसका मन पुरा शान्त हो चुका था। उसे पहले कभी भी ऐसी खुशी और मन की शान्ती महसूस नही हुई थी।

तभी उसने सोचा ऐसे अनुभव को लिख लेता हूं उसने अपना लेखनी लाया और देखा की उसके सभी पन्नो पर लिखा है मौन और सबसे उपर मे लिखा है सबसे बडा ज्ञान।

तब उसे ऐहसास हुआ की यही सबसे बडा ज्ञान है। मौन ही सबसे बड़ा ज्ञान है। गुरू जी मुझे रोज ज्ञान दे रहे थे मै ही उसे नही ले पा रहा था।

मौन ज्ञान नही है।

वह पूरी रात बैठा रहा और मौन का अनुभव करता रहा। सुबह होते ही वह गुरू के पास गया और उनके सामने बैठ कर बस उन्हे देख रहा था।

गुरूजी समझ गये की शिष्य को मौन मिल गया है। गुरू ने कहा मौन ज्ञान नही है लेकिन मौन ही ज्ञान का आधार है। यह हमे वह देखने मे मदद करता है जो हमारे आंखो के सामने होते हुए भी हम नही देख  पाते है।

बाहर भले ही कितना भी शोर हो लेकिन मन के भीतर मौन होना चाहिये।

शिष्य ने अपनी लेखनी गुरू को समर्पित कर दी, फिर कभी उसने कुछ नही लिखा उसके बाद उसने सिर्फ महसूस किया, ऐहसास किया और असली ज्ञान को प्राप्त किया।

मनुष्य जीवन मे सब कुछ के पीछे भागता है लेकिन वह कभी मौन को पाने की नही सोचता।

जीवन मे भले ही हम सब कुछ हाशिल कर ले लेकिन जब तक हम लोग अन्दर से शान्त नही होंगे तब तक हम चैन से नही रह सकते हैं।

जीवन मे मन की शान्ति, मौन प्राप्त कर लेना यही सबसे बड़ा ज्ञान है।

अगर आप यह पढ़ रहे हैं तो यहां तक आने के लिये धन्यवाद मुझे आशा है की आपको गुरु ने दिया ज्ञान और शिष्य बन गया महान की हिन्दी कहानी पसंद आई होगी ।

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